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धार्मिक साहित्य और नेैतिक मूल्य

धार्मिक साहित्य और नेैतिक मूल्य

डाॅ. के.वी.एल्. संध्या रानी,
प्राध्यापिका
बी.वी.के. काॅलेज
विशाखापट्टणम्, आन्ध्र प्रदेश

 

समाज और व्यक्ति एक दूसरे के पूरक होते हैं । एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं कर सकते । अरस्तू के अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इस बात का सरल अर्थ है कि मनुष्य अपने अस्तित्व और विकास केलिए समाज पर जितना निर्भर है उतना और कोई प्राणी नहीं । मनुष्य में हम जो भी कुछ सामाजिक गुण देखते हैं वह समाज की ही देन है ।एक व्यक्ति की प्राथमिक पाठशाला उसका अपना परिवार होता है । और परिवार समाज का अंग है । घर में ही हमें सब से पहले शिक्षा मिलती है । आज हमारे समाज का स्वरूप तेजी से परिवर्तित हो रहा है, ये भी सही है कि परिवर्तन इस संसार का नियम है लेकिन हमारे समाज में नेैतिक मूल्यों का ह्रास होता है, वो सही नहीं है । प््रााचीन काल में पाठशालाओं में धार्मिक और नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग थे। हरबर्ट के अनुसार ‘‘नैतिक शिक्षा से पृथक नहीं है, जहॅां तक नैतिकता धर्म का अर्थ है, इन दोनों का अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है । इस बात को याद करना है कि धर्म के बिना नैतिकता का और नैतिकता के बिना धर्म का अस्तित्व नहीं है । किसी भी व्यक्ति में नैतिक मूल्यों का होना ही धर्म है, नैतिक मूल्यों के अनुरूप आचरण ही उसे चरित्रवान बनाता है । नैतिक मूल्यों का पालन ही सदाचार है । सदाचार व्यक्ति को दैवत्व की ओर ले जाता है । और दुराचार से पशु बना देता है ।

राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध एवं विवेकानंद साक्षात् ईश्वर ये सब देवता गण क्योंकि इनके कर्म नैतिक मूल्यों के अनुरूप थे । उनमें चरित्रबल था । सच्चरित्र थी, नैतिक -मूल्य, सत्यप्रियता, त्याग, उदारता, विनम्रता, करूणा, हृदय की सरलता आदि उन लोगों में पाया जाता है । आजकल इस प्रकार की गुणों को आचरण करनेवाले लोग बहुत कम हो गये । आज का व्यक्ति दूसरों को ‘भलाई करने‘ की बात भूल गयी । तुलसीदास जी ने कहा है-‘परहित सरिस धर्म नहीं भई ।‘ वर्तमानका में सदाचार की जगह औपचारिकता लेती जा रही है । हर इन्सान के भीतर सही-गलत का निर्णय करने केलिए अंतरात्मा है, जिसकी आवाज़ हमें सडी और गलत का अंतर बताती है । ये बताती है कि कोैन सा कार्य सही है और कोैन गलत, हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? अगर हम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ के अनुरूप आचरण करें तो नैतिक मूल्यों की उपेक्षा कभी नहीं करेंगे ।

व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का मुख्य उत्तरदायित्व परिवार और विद्यालय पर होता है और ये उत्तरदायित्व तभी पूरा किया जा सकता है, ज बवह उसे धार्मिक और नैतिक शिक्षा प्रदान करे । शिक्षा अयोग के शब्दों में विद्यालय पाठ्यक्रम का सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक की शिक्षा प्रदान करना है । यदि हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को सुरक्षित और विकसित करना चाहते हैं तो प्रत्येक शिक्षा संस्थान मंे धार्मिक ओर नेैतिक शिक्षा का उपयुक्त आयोजन किया जाना आवश्यक है । विद्यालय पाठ्यक्रम में धार्मिक व नैतिक शिक्षा को उचित स्थान मिलना चाहिए, एक व्यक्ति अपने जीवन दर्शन, प्रेरणा और नैतिकता से आत्मिक बल प्राप्त करता है । सत्य, विनय, करूणा, क्षमा, स्नेह, सहानुभूति, आत्मनिर्भरता, निर्भीकता, वीरता, आत्मत्याग ये सारे नेैतिक मूल्य एक व्यक्ति को चरित्रवान बनाते हैं । सद्गुणों को अपनाने से हमें सच्चा सुख, संतोष और आनंद प्राप्त हो सकता है । आज हमारा समाज नैतिक पतन की ओर अग्रसर हो रहा है । यदि हर व्यक्ति सदाचार के महत्व को समझे और चरित्र-बल का विकास करे तो छल-कपट, पाखंड, षडयंत्र और संघर्षों से हमारा समाज मुक्त हो सकता है । सब लोग अपने परिवार, मित्रों,, रिश्तेदारों और समाज केलिए भी समय निकाले, मुख्यतः बच्चे जो कल देश का भविष्य बनेंगे, उन्हें धर्म और नैतिक मूल्यों का महत्व समझाएं ं एक-एक अच्छे व्यक्ति से एक अच्छा परिवार बनेगा, एक-एक अच्छे परिवार से एक अच्छा समाज और एक अच्छा समाज से सुसंस्कृत देश की पहचान बनेगा।

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