Blog

मृणाल पांडे कृत ‘देवी’ उपन्यास’ में चित्रित मानव-मूल्य _ डाॅ. काकानि श्रीकृष्ण

मृणाल पांडे कृत ‘देवी’ उपन्यास’ में चित्रित मानव-मूल्य
डाॅ. काकानि श्रीकृष्ण
सह-आचार्य,
आचार्य नागार्जुन विश्व विद्यालय,
गुंटूर, आंध्रप्रदेश

आधुनिक हिंदी साहित्य में मृणाल पांडे सर्वतोमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार है |वे कहानीकार ,उपन्यासकार के साथ –साथ नाटककार तथा कृतिकार के रूप में प्रसिद्द हैं|उनकी नाटक ,कहानी और उपन्यास साहित्य का इन सभी विधाओं में सामान रूप से योगदान रहा है | मृणाल पांडे ने पत्रकारिता और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में अपने सामयिक और प्रासंगिक लेखन द्वारा अपनी लेखकीय ज़िम्मेदारी का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया है |पत्रकारिता मृणाल पांडे का हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती है |
1. “हमारी सामाजिक परम्पराएं और जीवनमूल्य व नियम सभी स्त्री को दोयम दर्जे में रखने का प्रयास है प्रभा खेतान ने सही लिखा है “स्त्री विरोधी वाक्यों और इन विशेषणों से हमारे शास्त्र भरे पड़े हैं|इन ज़ुल्मों को सुनना और झेलना औरत की नियति रही है |”हमारे परंपरागत मूल्यों के आधार पर स्त्री को कदम –कदम पर शोषण व उत्पीडन झेलना पड़ता रहा है उसको पतिव्रता नारी बनने के लिए गांधारी के सामान अँधा होना पड़ता था |विधवा होने पर उसे अच्छे कपड़ों से अच्छा खाने से वंचित रहकर जीवन घसीटना होता था साथ ही उन्हें पुनर्विवाह न करने ,और सती हो जाने जैसे अनेक प्रतिबन्ध लादे गए थे स्त्रियों के लिए वेदपाठ और विशेष धार्मिक अनुष्ठान करने की मनाही थी जबकि पति ,पिता पुत्र भाई के लिए व्रत रखना और उनके अनुसार जीवन यापन करना उसका जीवन उद्देश्य हो गया था मानो स्त्री का अपना कोई अस्तित्व नहीं हो | जीवन के मूल्यों की आदर्शों की पकड़ ढीली होने से स्त्री को प्रतिबंधित जीवन जीना कम हो गया है वह समाज की परवाह न करते हुए अपने जीवन की स्वतंत्र रास्ते तय कर सकती है वह अपने अस्तित्व के बारे में सोचने लगी हैं,स्त्री के गुलामी के कष्ट कुछ कम होने लगे हैं यह ज़रूर है की पुरुषों पर भी सामजिक दबाव कम होने से अर्थ का प्रभाव बढ़ने से स्त्री पर होने वाले योन अपराध बढे हैं|आज की स्त्री सामाजिक परम्पराएं और जीवन मूल्य के संक्रमण से होनेवाले योन अपराधों से कुछ डरी अवश्य हैं लेकिन वह उन परम्पराओं और जीवन मूल्य को वापिस प्राप्त करना नहीं चाहती जो उसे सामान्य जीवन जीने नहीं देते हैं|
2. “देवी उपन्यास “में देवी के उन्मुक्त रूप में स्त्री की स्वतंत्रता दिखाई देती है और स्त्री पर लादे गए आदर्श बनाम बंधन टूटते हुए प्रतीत होते हैं|देवी रूप “उनका सामूहिक रूप से बाल खोले ,त्रिशूल ,वीणा ,पुस्तक खाप्पण या मदिरा पान हाथ में लिए लोलजिव्हा वाली ,रक्तदंतिका ,ठठहाकर हँसने या गला फाड़कर हुंकार करनेवाली देवियों के माध्यम से अपनी गुप्त ,आकांक्षाओं को तर्कसंगत ही नहीं पूज्य बनाकर उनका सार्वजनिक समारोह करना नितांत तर्कसंगत ही तो ठहरता है |”इस प्रकार स्त्रियाँ देवी के इस स्वेच्छधारी उन्मुक्त रूप को अपना आदर्श मानती है | मृणाल पांडे ने “देवी “में अपनी माँ की चर्चा करते हुए बताया है कि उन्होंने हमें एक स्त्री के लिए आवश्यक माने जानेवाले कार्य सिलाई कढ़ाई आदि की शिक्षा न देकर पढाई लिखाई में ही पुरुषों के बराबर दर्जा देने का प्रयास किया |ललिता मौसी के बारे में मृणाल पांडे लिखती हैं,”दादा ने उसे वह परम गोपनीय मन्त्र भी सिखाया जो पीढ़ियों पुरुष अपने बेटों के कानों में सुनाते आये थे कि कही औरतों और गैर –जात के लोगों के कानों में न पड़ जाए |”उनकी मौसी ने वेद पाठ ,गायत्री मन्त्र सीखा जो स्त्रियों के लिए वर्जित था अपनी शिक्षा के बल पर अपने जीवन को अपने ढंग से जिया ,जबकि भारतीय संस्कृति साहित्य दर्शन ,चिंतन की दुनिया से इसलिए दूर रखा,ताकि वह शिक्षित ,चेतन ,सजग वह आत्मनिर्भर न बन जाए |
3. “देवी उपन्यास :में इन पैमानों को तोड़कर आत्मनिर्भर व्यक्तित्व रूप में स्त्री उभरआई है ललिता मौसी के दादा ने उन्हें गायत्री मन्त्र इस कारण सिखाया था ताकि वे अपने बेटे के खिलाफ उसे मोहरे के रूप में खड़ा कर सके,परिणाम स्वरुप “वह घर से दूर रह सकती थी और क्योंकि दूर रहकर ही वह पैसा भी घर भेज सकती थी ,इसलिए कोई उससे घर लौट आने की जिद न करता |”और ललिता मौसी पूर्ण –पुरुष –सामान स्वतंत्र व्यक्तित्व रखती थीं| हमारे समाज में जीवन मूल्यों की पकड़ ढीली होने से स्त्री पर थोपे गए सामाजिक नैतिक मूल्यों की जकडन भी कम होगी |क्योंकि इन नियमों ,कानूनों ,सिद्धांतों में स्त्री को पराधीन बनाने की साजिश रही है राजेन्द्र यादव लिखते है ,”नारी की महिमा का गुणगान सांस्कृतिक औदात्य की ज़रूरतें दोनों अलग –अलग हैं तथा एक दूसरे की पूरक |पता नहीं यह गुणगान प्रायश्चित है य बेवक़ूफ़ बनाने की साज़िश लफ्फाजी |”वास्तविकता के धरातल पर पैतृक –मूल्यों में स्त्री का सम्मान एक ढकोसला था |
जो स्त्रियाँ हमारे उन आदर्शों ,मूल्यों के अनुसार चली ,जो स्त्रियों को गुलाम बना कर उनका शोषण करने के लिए बनाये गए थे ,वे जीवन में कष्ट ही प्राप्त कर पाई |मृणाल पांडे उन पांच महिलाओं का उदाहरण देती है जिनकी हमारे चर्चा हमारे ग्रंथो में बड़े भक्तिभाव से की जाती है ये है अहिल्या ,द्रौपदी ,तारा ,कुंती मंदोदरी |मृणाल पांडे लिखती है ,”भक्तिभाव से प्रातः काल स्मरण किये जाने वाले इन नामों के पीछे स्त्रियों के लिए एक गूढ़ सन्देश छिपा है |ये पांच जीवन क्या बताते हैं?हमारी संस्कृति की समकालीन मूल्यों और दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों के संकेत पहचाने तो सत्य के प्रति आग्रह रखने के कारण ही इन स्त्रियों ने इतना दुःख पाया |”पुरुषों के बनाये समाज में स्त्री को त्याग का ही पाठ पढाया जाता है पुरुषों के लिए मूल्यों की डोर तो पहले से ही ढीली है | मूल्यों में संक्रमण का प्रभाव यह हुआ कि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति उसको मूल्यों ,नियमों ,आदर्शों की अवहेलना को अधिक महत्व नहीं देती है |”देवी “उपन्यास की शोम्पा कलकत्ता में देह व्यापार में घुस जाने पर स्वयं ही इस धंधे की प्रबंधक बन बैठी और धन कमाकर सबके सामने मुह उठाकर बोलने लगी है वह स्वयं कहती है “उनके सिर पर चांदी का जूता मारो माँ यह तो तुम्हारा किया धरा सब खेल झेल लेंगे |”आर्थिक रूप से सबल स्त्री को समाज अधिक प्रताड़ित नहीं करता है | शोम्पा की भांति रेवती भी धन कमाने के लिए कलकत्ता जाकर देह व्यापार करती है और समय से अपनी माँ को पैसे भेजती है जबकि उसका भाई ऐसा नहीं करता है वास्तव में पुरुष वर्ग के अपने आदर्श मूल्यों को भूलने से मूल्य संक्रमित हुए है |लेखिका “देवी “के अन्य घटनाक्रम के बारे में चर्चा करते हुए कहती है ,”गाँव की ज़्यादातर जवान लडकियां नौकरानी बनने के लिए कलकत्ता “भेजी गयी हैं सब की सब बराबर पैसा घर भेजती हैं|अलबत्ता बेटे एक बार शहर आने के बाद शायद ही कभी दिखाई देते हैं|”लेखिका इन तथ्यों का वर्णन यथार्थ के धरातल पर किया है |
अर्थ का महत्व बढ़ने और मूल्यों का महत्व कम होने से स्त्री ने स्वतंत्रता का फल चखने के अतिरिक्त योन अपराधों को भी झेला है ,स्त्री के साथ बलात्कार बढे हैं,एक पत्रकार होने के अनुभव से लेखिका ने “देवी “उपन्यास में स्त्रियों के साथ होनेवाले योन शोषण को दर्शाया है ,जैसे रुपेन के साथ एक पुलिस अधिकारी ने सरेआम छेड़खानी की ,रुपेन ने अपने साथ हुए इस दुर्व्यवहार का बदला लेने को लिए सात वर्ष तक कानूनी लड़ाई लड़ी तत्पश्चात न्याय की प्राप्त हुई | इसी तरह की घटना “देवी “उपन्यास के उन मजदूर बधुआ औरतों के साथ हुई जो खली पड़ी सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करने गयी थीं|पोचाम्मा की बहू का हाल ही में प्रसव हुआ था उसको न पीटने का निवेदन करने पर “पुलिस ने दावे की सच्चाई परखने के लिए बहू की साडी उठवाकर देखा ,”पुलिस इन देहाती क्षेत्रों में आकर अक्सर ऐसा करती है ,”चुनौती देने वालियों का पीटती है घसीटती है ,नंगा करती है ,बलात्कार करती है |उन्हें ट्रकों में थाने ले जाया जाता है ,कुछ औरतें कभी नहीं लौटती |”बलात्कार और योवशोषण केवल पुलिस वर्ग ही नहीं करता रहा है अन्य पुरुष वर्ग का भी यही हाल रहा है |
मृणाल पांडे देवी में भंवरी के वृत्तान्त को बतलाकर यह दर्शा रही हैं,कि जीवन में विशेषकर कुठित समाज में नैतिक मूल्य समाप्त ही हो चुके हैं,भंवरी गाँव की महिला है जिसने सामजिक कार्यकर्ता के रूप में बाल विवाह आदि कुरीतियों के लिए गाँव के कुपित पुरुषों ने भंवरी के साथ उसके पति के सामने बलात्कार किया ,”उसने एक बालविवाह रुक वाने का प्रयास किया था जिससे कुपित गाँव के मोतबर पुरुषों की एक टोली ने उसके घर पर आक्रमण किया ,बचने के लिए पकाकर रखे मिट्टी के बर्तन –भांडे तोड़ दिए और भंवरी को घसीटकर झोपड़े से बहार निकाल लिया फिर भंवरी पर बलात्कार हुआ |”भंवरी पर सामूहिक बलात्कार की वह घटना का कारण योन कुंठा नहीं थी बल्कि भंवरी को बेईज्ज़त बदला लेने का प्रयास था यह उसके बाल विवाह रोकने के प्रयास की सजा थी | मूल्यों में विघटन और अर्थ का महत्व अधिक होने से सत्तावर्ग भी अधिक शक्तिशाली हो गया है जिसके परिणामस्वरूप स्त्री के हिंसा प्रताड़ना में भी वृद्धि हुई है राजकिशोर लिखते है कि “गाँवों में ताक़तवर जातियों की स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार या उन्हें नंगा घुमाना कामुकता की कम हिंसा और अपमान की घटनाएं ज्यादा हैं|”मूल्यों में संक्रमण का ही प्रभाव है कि पुरुष स्त्री में गुलाम व उपभोग की वस्तु का रूप अधिक देखने लगा है और देवी और माँ का कम | “रास्तों पर भटकते हुए “उपन्यास में मंजरी क्योंकि शिक्षित है नए विचारों की है वह अपने पति को परमेश्वर माननेवाले नियमों को नहीं मानती है इसी कारण मूल्यों के इन बदलाओं से खुश है और अपने तलाक़ के बारे में कहती है ,”कही मेरे भीतर इस तलाक क़ानून के लिए कृतज्ञता का भाव है,जिसके एक वार ने एक दमघोंटू नारकीय जीवन से मेरी गर्भनाल काटी और मुझे आज़ाद कर दिया| उस परिवार से यथासंभव दूर छिटक कर तब से निरंतर एकाकी कक्षा में भटकती घूमती ,मैं आज भी उस फैसले को कृतज्ञता से याद करती हूँ “यही नहीं मंजरी की सास को भी बहू-बेटे का तलाक हो जाने पर ख़ुशी मिलती है |पितृसत्तात्मक मूल्यों की गिरावट के कारण ही मंजरी की यह स्वतंत्रता संभव हुई | मंजरी की माँ आम भारतीय माँ की भांति जो बेटी को कम समाज को अधिक महत्व देती नहीं प्रतीत होती है ,उसके लिए बेटी की खुशियों का महत्व अधिक है ,तभी तो वह अपनी बेटी मंजरी को नौकरी करने और अपने जीवन की सुरक्षा चक्र को मज़बूत करने की सलाह देती है कहती है ,”अरे मैं मूर्ख हूँ ,तभी तो तुझसे वह सब कह रही हूँ ,ताकि तू भी मेरी तरह कष्ट नहीं झेले |तेरा घर उजड़ा तब मैं चुप रही ,दूध की मखी की तरह तेरे उन सास –ससुर ने तुझे अलग कर दिया जो यहाँ हमारी दहलीज़ पर नाक रगड़कर तेरा रिश्ता ले गए थे |मैं चुप रही सिर्फ इसलिए कि तब तूने कहा था की कुछ मत कह ,मैं हज़ार बात कह सकती थी पर तेरा मुह देखकर गम खा गई |फिर तूने नौकरी की ,छोडी फिर की ,फिर छोड़ी |तब भी मैं साथ खडी रही ठीक है पर कही कोई धुरी तो बनानी चाहिए ही न ?”उसकी अपनी बेटी की ख़ुशी के लिए समाज की जवाबदेही की परवाह नहीं कर रही है | इस उपन्यास में पार्वती एक महत्वकांक्षी नारी है वह किसी प्रकार के नैतिक मूल्यों की परवाह नहीं करती है और अपनी आवश्यक्तापूर्ति के लिए कुछ भी करने को तैयार है |समाज में अनाचार भ्रष्टाचार के रहते मंजरी पत्रकारिता की नौकरी नहीं कर पाती है क्योंकि वह एक स्वावलंबी नारी है उसे किसी भी प्रकार का समझौता या दबाव नामंज़ूर है वह पत्रकारिता की नौकरी छोड़ देती है |उसके सहयोगी और संपादन उसे ऐसा न करने की सलाह देते हैं उस वृत्तान्त का याद करती है ,”लगी –लगाई नौकरी ,वह भी आज के ज़माने में ,वह भी मेरे परिवार से बेदखल ,अपने समाज से दूर पड़ी औरत को यूं भी क्या छोडनी चाहिए ?छोटी –मोटी लाग दांत मालिकान की अच्छी हरकतें ,सहकर्मियों की ठिठोली बोली –ये सब तो चलते ही नहीं रहते है |इनसे ऐसा भी क्या बिदकना |”समाज में स्वीकृत इस प्रकार नैतिकता की उल्लंघना को मंजरी स्वीकार नहीं करती है ,जो समाज का हिस्सा बन चुके है |मंजरी मानती है कि आधुनिकता के साथ समाज में रिश्ते –नातों पर टिप्पणी करते हुए कहती है ,”सभी आज अंकल कहलाते है |नई दुनियाँ ,नए रिश्ते |ऐसे बनते है कोआपरेटिव |ऐसे बसते है लोगबाग |उसकी नींद में तो कभी कभार पितर आकर उन्हें याद दिला जाते हैं|तरपण करने की पितृदाय की |”मंजरी भी मानती है कि आज के समाज में व्यक्ति का व्यक्ति से प्रेम सम्मान सब समाप्त हो गया है कि संबंधों में एक छलावा है |मंजरी मानती है कि व्यक्ति में प्रेम करने की क्षमता कम हो गयी है अब वह प्यार पर विश्वास नहीं करती है |
मंजरी समाज में फैले अनाचार से दुखित हो गयी है क्योंकि उसने अपने पति व ससुराल पक्ष का बदलता व्यवहार देखा ,यही नहीं उसके भाई का व्यवहार भी उसके प्रति बदल गया है ,जो भाई बचपन में अपनी बहन की फीस जमा करने के लिए अपनी साइकिल बेच देता है आज वही भाई उससे केवल औपचारिक सम्बन्ध रखता है |जो भाई –बहन एक दूसरे के लिए मिलते है मंजरी भाई के साथ संबंधों के बारे में सोचती है ,”दो नक्षत्रों की तरह हमारी कक्षाएं ख़ास तीज त्यौहार तिथि –वार पर हर साल कुछ पलों को पास आती है और फिर अपनी राह मापती है |”मंजरी का संबंधों पर से विश्वास उठ गया है |जब खून के संबंधों में बदलाव आ गया तो फिर ससुराल पक्ष के व्यवहार से क्यों विचलित हो | मंजरी अपने दोस्त बच्चे बंटी की मौत से बहुत दुखी है उसकी आकस्मिक मौत ने मंजरी को बहुत मानसिक भावनात्मक चोट पहुंचाई है वह बंटी की मौत की पुलिस तंत्र और राजनेता आदि में किसी को भी एक बच्चे की मौत ने मंजरी को मौत के बारे में सोचती है ,”कहते हैं,आज की दुनिया में मौत भी अपना मतलब खो चुकी हैं उत्तर आधुनिक बन गयी है मौत भी रिश्तों की तरह |”मंजरी के जीवन में समीप के अधिकतर रिश्तें टूट जाते है इसके बावजूद वह स्वयं को टूटने नहीं देती है |मंजरी का जीवन ,मूल्यों की गिरावट ,रिश्तों की टूटने के कारण बहुत कष्टकर रहा है पर ये आधुनिक मूल्य मंजरी को लड़ने की सामर्थ्य भी दे पाए हैं क्योंकि मंजरी की शिक्षा और आधनिक स्वतंत्रता ने उसको जीवन जीने का साहस दिया है वह अपनी माँ से भी इस विषय में वाद –विवाद करती हैं कहती हैं,”वो सब भी अगर अपनी ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जी सकते हैं,तो बस मेरे ही लिए तेरे पास इतने हिदायतें क्यों हैं?अपने बेटे बहू के आगे तो तुम्हारी जुबान नहीं हिलती है ?”मंजरी अपनी माँ से अपने साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने का आरोप लगाती है वह तर्कशील स्त्री की भांति सोचती है जबकि हमारे पारिम्पिरिक समाज में अधिक बोलनेवाली ,तर्कशील जागरूक प्रबद्ध स्त्रियों को समाज अच्छा नहीं समझता है |
संदर्भ –ग्रन्थ सूची : जीवन के मूल्यों की आदर्शों की पकड़ ढीली होने से स्त्री को प्रतिबंधित जीवन जीना कम हो गया है वह समाज की परवाह न करते हुए अपने जीवन की स्वतंत्र रास्ते तय कर सकती है वह अपने अस्तित्व के बारे में
1जीवन के मूल्यों की आदर्शों की पकड़ ढीली होने से स्त्री को प्रतिबंधित जीवन जीना कम हो गया है वह समाज की परवाह न करते हुए अपने जीवन की स्वतंत्र रास्ते तय कर सकती है वह अपने अस्तित्व के बारे में.प्रशाश्वेतान ,सं अरविन्द जैन ,औरतः अस्तित्व और अस्मिता ,पृष्ट .सं:
12
2.मृणाल पांडे ,देवी भूमिका से
3.मृणाल पांडे ,देवी ,पृ.सं:67
4.मृणाल पांडे ,देवी ,पृ .सं :79
5 .राजेन्द्र यादव ,हंस ,नवम्बर –दिसम्बर 1994 ,पृ .सं :07
6 .मृणाल पांडे ,देवी ,पृ .सं :161
7 .मृणाल पांडे ,देवी पृ .सं :172
8 .मृणाल पांडे ,देवी ,पृ .सं :83
9 .मृणाल पांडे ,देवी पृ .सं :166
10 .मृणाल पांडे ,देवी पृ .सं :168
11 .मृणाल पांडे ,देवी पृ .सं :141
12 .राजकिशोर ,स्त्री –पुरुष कुछ पुनर्विचार ,पृ .सं :113
13.मृणाल पांडे ,रास्तों पर भटकते हुए ,पृ .सं :33
14.मृणाल पांडे ,रास्तों पर भटकते हुए ,पृ .सं :50
15 .मृणाल पांडे ,रास्तों पर भटकते हुए ,पृ .सं :126
16 .मृणाल पांडे ,रास्तों पर भटकते हुए ,पृ .सं :13
17.मृणाल पांडे ,रास्तों पर भटकते हुए ,पृ .सं :18
18 .मृणाल पांडे ,रास्तों पर भटकते हुए ,पृ .सं :60
19 .मृणाल पांडे ,रास्तों पर भटकते हुए ,पृ .सं :50 -51


free vector

Leave a Comment

Name

Email

Website