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शैलेश मटियानी की कहानी दुरगुली में चित्रित मानव अधिकार उल्लंघन : डॉ. विजय भारती जेलदी

शैलेश मटियानी की कहानी “दुरगुली” चित्रित मानव अधिकारों का उल्लंघन
मानवाधिकार हमारे मान सम्मान से जुड़े हुए हैं। मानवाधिकारों की सुरक्षा हम सब का कर्तव्य है।”संविधान में बनाए गये अधिकारों से कहीं बढकर महत्व मानवाधिकारों का माना जा सकता है। “1.सबको समान रूप से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने का हक है। नस्ल, जाति,धर्म, रंग,लिंग आदि के आधार पर कोई भेद भाव नहीं होना चाहिए। किसी भी प्रकार से अगर किसी व्यक्ति को अपने अधिकारों से वंचित किया जा रहा हो तो वह मानवाधिकार आयोग को शिकायत कर सकता है।
परंतु भारत में कितने प्रतिशत के लोग यह जानते हैं कि अपने अधिकारों से वंचित किए जाने पर हम उनके विरुद्ध लड भी सकते हैं, या कितने लोग यह जानते हुए भी आगे नहीं बढ पा रहे हैं। इसी कारण वश भारत में आज भी बाल श्रम पाया जाता है। जाति,धर्म और लिंग संबन्धी भेद भाव अभी भी भारत में विद्यमान हैं।जिससे मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। कभी जाति के आधार पर दलित वर्ग ,,कभी धर्म के नाम पर अल्पसंख्यक,कहीं लिंग के आधार पर महिलाएँ, कहीं बाल श्रम के कारण बालक अपने अधिकारों से वंचित किए जा रहे हैं।
प्रस्तुत लेख में शैलेश मटियानी जी के द्वारा रचित कहानियों के माध्यम से यह प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है कि भारतीय समाज में किस प्रकार मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। भारतीय समाज में परिवार एक महत्वपूर्ण अंग है। परिवार के हर सदस्य को अपने अपने कर्तव्य निभाने की आवश्यकता है,और अपने अधिकार प्राप्त करने का हक भी है।
पारिवारिक अधिकारों का उल्लंघन : दुरगुली कहानी का सबलराम जो दुरगुली का पति था,वह अपनी पत्नी व तीन बच्चों को निराधार छोड़कर चला जाता है।2.वह अपने पति व पिता होने के कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करता और पुनली नामक स्त्री के प्रपंच में फस कर अपनी धर्म पत्नी व संतान को अपने हाल पर छोड़ देता है जिससे उनके “पारिवारिक अधिकारों का हनन हुआ है। “दुरगुली का संबल टूट गया, बच्चों के सर पर पिता का छत्र छाया नहीं रहा। जो दुरगुली सब को नैतिकता का पाठ पढाया करती थी,वह अब दिन दिन क्षीण होती बच्चों की स्थिति को देख विवशता के कारण धनाढ्यों के हवस का शिकार बन जाती है।
आर्थिक अधिकारों का उल्लंघन: दुरगुली को अपने बच्चों के पालन-पोषण केलिए अपनी पवित्रता को खोना पड़ता है। जब सबल राम उसके साथ था, तो दुरगुली उस पर बुरी नज़र डालने वालों के मुह बंद करवा देती थी। उर्बादत्त और पान सिंह जैसे लोग “दुरगुली भौजी “कहते हुए एक तरफ चले जाते।3. चंद्र वल्लभ के यह कहने पर कि” ऊँची जात के पंडित की संग-सोहबत पूर्व जन्म के पुण्य प्रतापों से ही मिला करती है तुझ जैसी डुमणी को।”4. तो वह यह कह कर अपने घर की ओर चली जाती है कि”जात-औकात की औरत केलिए तो उसका सबल राम ही बड़े-बड़े पंडितों से ज्यादा पवित्र ठहरा।”5. उस गाँव में निम्न जाति की औरतों पर अग्र वर्ण के ठाकुर-ब्राह्मण अपना अधिकार मानते थे। उस गाँव की कोई भी दलित वर्ग की स्त्री चरित्रवान नहीं रह पाती थी। ऐसे में एक दुरगुली ही थी जो यह सोचती थी कि उसकी बिरादरी की जो डुमणिया ठाकुरों-ब्राह्मणों के साथ बद फेलियों में फसी हुई है,उन्ही के बीच में रहते हुए दुरगुली यह साबित करके दिखा देगी कि अपनी जो नीयत साफ रहे और खरा स्वभाव रखा जाए, तो किसी ऐरे गैरे की क्या औकात कि जो पराई अमानत में खयानत कर जाए।
ऐसा दर्प दिखाने वाली दुरगुली का भी धर्म भ्रष्ट हो ही गया। राजी खुशी से नहीं बल्कि लाचारी से। पति के वापस लौटने के आसार ख़त्म हो गए। चंद्र वल्लभ ने अपने यहाँ काम-काज केलिए बुलाना बंद कर दिया क्योंकि दुरगुली ने उसकी बात नहीं मानी थी। हयात सिंह ने भी अपने खेत में पांव रखने मना कर दिया था क्योंकि दुरगुली ने उसको भी फटकार दिया था। उस गाँव में एक माधव सिंह ही था जो उसे बहू कहकर बुलाता था। इस प्रकार ममता से व्यवहार करने वाले दो चार और होते तो दुरगुली खुशी से अपना जीवन काटती।परंतु ऎसा नहीं हो पाया। दुरगुली को अपनी आर्थिक हीनता के कारण चंद्र वल्लभ और हयात सिंह के शारीरिक शोषण को मौन रहकर सहना ही पड़ा। दुरगुली के आर्थिक एवं शारीरिक अधिकारों का हनन किया गया।
सामाजिक (समानता) अधिकारों का उल्लंघन: दुरगुली हयात सिंह के यहाँ गौशाला लीपने गयी थी। हयात सिंह की पत्नी स्वरसती कलेवे की रोटियां लिये हडबडाती हुई आई और खुद ही दुरगुली से टकराई उलटे उसे ही कहने लगी कि”रोटियों को छू करके उसे एकदम अशुद्ध कर दिया ……..कैसे खाओगे इस डुमणी की छुई हुई रोटियां “6.हयात सिंह भी कहने लगा कि मै कैसे खा सकता हुं।”7 दुरगुली स्थब्द रह गयी। अगले दिन चंद्र वल्लभ के घर धान कूटने मूसल लेकर पहुँची। मूसल से टकराकर तुलसी के पास रखी कलशी लुढक पडी। चंद्र वल्लभ की पत्नी पद्मावती बाहर आई और उस पर चिल्लाने लगी।” न मालूम कहां से चुड़ैल जैसी आ पहुँची…………..कमीन जात की डुमणी का।”8. चंद्र वल्लभ बाहर आकर कहने लगा कि “जब से सुराज हो गया है,डूमों की आंखें एकदम आकाश चढगयी है।”9 दुरगुली क्रोध से उन पर चिल्लाने तो लग गयी थी पर इस बात से यह साबित होता है कि स्वतंत्रता के बाद भी अस्पृश्यता की भावना लोगों के मन से मिटी नहीं। समाज का एक वर्ग सामाजिक असमानता से त्रस्त है।इस प्रकार उस वर्ग के सामाजिक समानता के अधिकारों का हनन हो रहा है।
अत: श्री शैलेश मटियानी जी की यह कहानी विविध प्रकार के मानवाधिकारों के उल्लंघन को दर्शाती है। पारिवारिक,सामाजिक , आर्थिक व शारीरिक शोषण के कारण किस प्रकर एक नारी के अधिकारों का हनन हुआ है इस कहानी में दृष्टव्य है। यह कहानी इसका प्रतीक है कि आज भी हमारे समाज में लोग अपनी इच्छाओं,आकांक्षाओं,अभिलाषाओं के विरुद्ध संघर्ष पूर्ण जीवन व्यतीत करने के प्रति बाध्य हो रहे हैं।


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