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मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथाओं में मानव-मूल्य

कुमारी अर्पणा,शोध छात्रा,

मगध विश्व विद्यालय, बोधगया

 

किसी भी साहित्यिक कृति के मूल्य निर्धारण हेतु उस रचना के कथा-काल का आकलन आवश्यक है। मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथाओं का कथा-काल भारतीय उपमहाद्वीप के आजादी पूर्व लगभग बीसवीं सदी के चैथे दशक से आरम्भ होकर 21 वीं सदी के सरहद को पार करती है। आधी सदी को अपने कथा-काल के रुप में समेटने का भगीरथ प्रयास मैत्रेयी ने किया है। मैत्रेयी ने अपनी आत्मकथाओं में जितने बङे कथा-काल को समेटा है, वह भारतीय इतिहास का एक बङा और महत्वपूर्ण काल है। आजादी के पूर्व से शुरु होकर आजाद भारत के नेहरु-युग, इन्दिरा-युग और बाद के दिनों को भी अपने कथांश बनाया है। इस लम्बी अवधी में भारत गुलामी से आजादी, पुनर्जागरण से भारत-निर्माण, लोकतंत्र से समाजवाद, समाजिक से आर्थिक प्रगति तक का नारा दे चुका है। जमींदारी-प्रथा के क्रूर यथार्थ को झेलने के बाद किसानों को लगान मुक्ति का सुख तक, नारी-शोषण के जालिम तरिकों से बेटी पढाओ, बेटी बढाओ के नारे तक, गोरो के आतंक से आजाद देष के दारोगा के जुल्मोसितम तक फैला मैत्रेयी की आत्मकथाओं का कथा-काल भारतीय समाज के समाजशास्त्रीय विश्लेशण के लिए उपयोगी स्रोत है।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथाओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन के तहत् पाठ में वर्णित समाज और सामाजिक संबंधों के ताना-बाना को जानना है। समाज मूलतः परिवारों का समुच्चय है। व्यक्ति प्रथमतः परिवार का सदस्य होता है, फिर वह समाज की अन्य इकाईयों से अपना संबंध स्थापित करता है। आत्मकथा में लेखक या लेखिका ही कथा का केन्द्रीय पात्र होता है। मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथाओं में भी केन्द्रीय पात्र मैत्रेयी ही है। मैत्रेयी के चतुर्दिक उसके परिवार और समाज के अन्य पात्र हैं। इन आत्मकथाओं में मैत्रेयी ने अनेक पात्रों का चरित्रांकन किया है। सर्वप्रथम मैत्रेयी की माॅ कस्तूरी आत्मकथा के प्रथम भाग ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ में प्रधान पात्र की भूमिका में दिखती है। आत्मकथा की लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के व्यक्तित्व निर्माण में सर्वाधिक प्रबल भूमिका उसकी माॅ कस्तूरी को जाता है, क्योंकि वह उसकी माॅ है। कस्तूरी और मैत्रेयी के संबंध को माॅ-बेटी के संबंध के रुप में देखते हुए हमें तत्कालीन परिस्थिति और परिवेश के संग समय का खयाल भी रखा जाएगा।

साहित्य रचना में लेखकीय प्रयोजन को स्पष्ट करने का आलोचकीय दायित्व तो शोधार्थी का बनता ही है। इसलिए अध्येता ने ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ के प्रथम अध्याय के पहले अंष की प्रस्तुती के लेखकीय प्रयोजन को तलाशने की कोषिष की है। लेखिका ने सबसे पहले विवाह को अपनी प्रस्तुती का केन्द्रीय विषय बनाया। विवाह भारतीय समाज में एक सामाजिक-धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। विवाह परिवार की धूरी है। विवाह का संबंध सामाजिक प्रतिष्ठा से जुङा होता है। विवाह आवश्यकता भी है और अनिवार्यता भी। विवाह जिज्ञासा भी है और आतंक भी। विवाह के प्रति व्यक्ति और समाज की स्पष्ट धारणा होती है। लेखिका ने विवाह के प्रति एक निम्न वर्गीय ग्रामीण बालिका की संवेदना को आकार दिया है। विवाह के प्रति कस्तूरी की भावना और धारणा ऐसी क्यों बन गयी है कि वह आहिस्ते से कह उठी – ‘मैं ब्याह नहीं करुॅगी।’ आखिर आजादी पूर्व की भारतीय  ग्रामीण समाज व्यवस्था में ऐसा क्या था कि जिस विवाह के प्रति जिज्ञासा और कौतुहल होना चाहिये , उसके प्रति भय और आतंक का माहौल बना था। ब्याह क्यों ? का उत्तर ढूॅढते हुए कस्तूरी इतना घबरा जाती है कि ‘दोबारा ब्याह के बारे में सोचना नहीं चाहती।’’ ब्याह को झमेला मानने वाली संवेदना के स्वरुप पर विशेष कुछ कहने को रह नहीं जाता।

शादी-विवाह स्त्री-पुरुष का पति-पत्नी के रुप में मिलन है। इस मिलन की अपनी सामाजिक अनिवार्यता है। स्त्री-पृरुष के इस वैवाहिक मिलन से अनेक सामाजिक और पारिवारिक दायित्व जुङ जाता है। विवाह के नाम पर स्त्री-पुरुष के इस मिलन से जिम्मेदारियों का क्षेत्र भले ही जितना व्यापक हो जाता हो, लेकिन विवाह के अन्य कारणों के अलावा एक कारण यह है कि स्त्री या पुरुष अकेलेपन से डरता है। उस अकेलेपन से बचने के लिए वह साथी की चाहत और तलाष करता है। कस्तूरी की माॅ ममता से भरकर बोलती है- ‘‘नहीं बेटा, मैं तो यह पूछने आयी थी कि सारी उमर कुआरी रहोगी, अकेली। तूझे डर नहीं लगता।’’ स्त्री-चेतना में विवाह से सुरक्षा का बोध सर्वाधिक प्रबल है। कस्तूरी की माॅ उसे अकेलेपन का आतंक दिखाती है तो कस्तूरी कहती है- ‘‘डर ही तो लगता है चाची। सच्ची ब्याह से बङा डर लगता है।’’ विवाह जो डर से सुरक्षा प्रदान करता है, वहीं बीसवीं सदी के चैथे दशक में ग्रामीण कृषि संस्कृति में अंग्रेजों और सामंतों के दोहरे शोषण तले पली-बढी लङकी कस्तूरी विवाह से ही डरती है। एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था जिसमें लङकियों के लिए विवाह भय का कारण बन जाय तो निश्चय ही यह सामाजिक शोध का विषय बनता है। पुरुष की सामंती, शोषणमूलक,वर्चस्ववादी, आतंकी स्वरुप की कल्पना स्वतः जग जाती है, जिसमें एक स्त्री दमित-शोषित होने के भय से हमेशा ग्रस्त रहती है।

विवाह से भय के अनेक कारण हैं। लेखिका ने पाठको की कल्पना को यहाॅ काफी स्पेस दिया है। विवाह से भय इसलिए भी कि एक स्त्री को अपने जङ-मूल से उखङकर दूसरी मिट्टी-पानी में पुनर्जन्म लेना पङता है। उस नवीन मिट्टी-पानी और उसकी आवोहवा से अज्ञानता उसके भय का कारण होता है। मैत्रेयी की कस्तूरी को तो विधवा होने और सती बनाये जाने से भी डर लगता है। स्त्री को पारिवारिक-सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने से डर नहीं लगता है। न ही डर लगता है पृरुषों के प्यार से। उसे तो डर लगता है उसके वर्चस्ववादी व्यवहार से, सामंती संस्कार से। कस्तूरी विवाह से डरती है, क्योंकि उसे पता है कि उसकी शादी किसी बूढे से की जा रही है। उसे इस अनमेल विवाह से डर लगता है। उसे डर लगता है सती होने से।

विवाह एक बंधन है। बंधन से सभी को डर लगता है। किशोर वय में इस बंधन के प्रति एक जज्बा होता है, जिसके विषय में  इशारा करती हुई लेखिका लिखती है- ‘‘वह दिन भर बरहे में (खेतों पर) बछङे-बछियों और उन चिडियों-तोतो के साथ रहती थी, जिनके लिए ब्याह के झमेले न थे।’’ मैत्रेयी की आत्मकथाओं में तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त तमाम् कुरीतियों का चित्रांकन मिलता है। सती-प्रथा, बाल-विवाह, अनमेल विवाह, रेप, ग्रूप रेप जैसे संगीन अपराध और प्रथा एवं परंपरा के नाम पर तमाम तरह की कुरीतियाॅ फैली नजर आती है। ऐसी तमाम सामाजिक समस्या स्त्री जीवन को बुरी तरह प्रभावित करती नजर आती है।

भारतीय समाज में बेटी के प्रति जो धारणा प्रचलित रही है, मैत्रेयी ने उसे प्रत्यक्ष करने की कोशिश की है। बेटी के जन्म से लेकर उसकी डोली और अर्थी उठने तक समाज में उसके प्रति जैसी धारणा देखने को मिलती है, लेखिका ने उसे उतारने का प्रयास किया है। लेखिका ने उन कहावतों और लोकोक्तियों को पे्रष किया है, जिससे बेटी के प्रति सामाजिक धारणा की छवि स्पष्ट होती है। जैसै -‘‘जिसकी बेटी कुॅआरी रहती है, उसकी सात पीढियाॅ गल जाती है।’’ या ‘‘गाय मरे अभागे की, बेटी मरे सुभागे की।’’ अथवा ‘‘जब खेती ने दगा दी, बेटी काम आ गयी।’’ इसी तरह बेटी से यह अपेक्षा की जाती है कि ‘‘बेटियाॅ बाप-भाईयों की मर्यादा और आबरु हर हालत में रखती आयी हैं।’’ औरतों की स्थिति का बयान करती हुई मैत्रेयी लिखती हैं- ‘‘औरत पर संशय -संदेह करने के लिए चाहिये ही कितना ?’’

जातिवादी और वर्णवादी समाज व्यवस्था ने भारत को उत्तरवैदिक काल से अपने गिरफत में ले रखा है। भारतीय समाज व्यवस्था वर्णवादी सिद्धांतों पर आधारित रहा है। संपूर्ण भारतीय समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र वर्णों में बॅटा यह भारतीय समाज व्यवस्था आरम्भ में भले ही कर्म आधारित रहा हो, लेकिन बाद के दिनों में यह जन्म आधारित हो गया। जबसे जन्मना कोई व्यक्ति ब्राह्मण और कोई शुद्र होने लगा तब से समाज में विभाजन और विरोध के स्वर फूटने लगे। भारतीय समाज में व्याप्त यह वर्णवादी व्यवस्था पिरामीडीय आकार का है, जिसके आधार में शुद्रों की एक बङी संख्या है। इसके उपर वैष्य और उससे उपर क्षत्रिय और सबसे उपर ब्राह्मण विराजवान हैं। इस वर्णवादी व्यवस्था में कर्म को उॅच-नीच की श्रेणी में विभक्त कर दिया गया है। समाज की गंदगी साफ करने वाला और तमाम् तरह का काम करके अपना पेट भरने वाला मेहनती मजदूर, जो इस पिरामीडीय समाज व्यवस्था में सबसे नीचे बङी संख्या में मौजूद है, के कर्मों को कमकर आॅका गया और पोथी-पतरा बाचना सबसे बङा काम बन गया और इसी आधार पर उॅच-नीच का भाव समाज में फैल गया। छुआछूत, दलित उत्पीङन, उूॅच-नीच, भेद-भाव की भावना ने समाज को अपने केंचुल में फॅसा लिया। मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथाओं में इस सामाजिक सत्य को अनेक विभिन्न छवियों में उकेरा गया है।

झाॅसी और उसके आसपास का ईलाका मैत्रेयी के बाल काल में मध्यकालीन अवशिष्ट संसकृति के रुप में वर्णवादी और जातिवादी व्यवस्था अपने निकृष्टतम रुप में मौजूद था। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ में मैत्रेयी ने अपने बचपन की यादों में उसे संजोया है। स्कूल में पढनेवाले बच्चों ने निम्न जाति के छात्र के संग जैसा दुव्र्यवहार किया वह तत्कालीन सामाजिक ढाॅचों और उसके स्वरुप की जानकारी देता है। बिसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का आरम्भिक काल दलितों के उत्पीङण का काल रहा है, इसकी गवाही हिन्दी आत्मकथाओं के इतिहास में मिल जाता है। जाति व्यवस्था की सबसे बुरी बात यह है कि  उसमें उॅूच-नीच का भेद-भाव घृणा के हद तक है। भारतीय समाज व्यवस्था की यह जातिवादी और वर्णवादी व्यवस्था भारत में आज भी बदस्तुर जारी है। मैत्रेयी ने अपनी आत्मकथाओं में भारतीय समाज की जातिवादी और वर्णवादी स्वरुप की विकृतियों को सामने लाया है।

टूटती सामंतशाही और बढता अफसरशाही यह भी आजाद भारत का एक सर्वविदित सच है। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ में मैत्रेयी ने उखङती अंग्रेजी सत्ता और दम तोङती सामंती व्यस्था और पनपती लोकतांत्रिक व्यवस्था का जीवंत चित्रण किया है। तभी तो लगान और गोरे के आतंक से भय ग्रस्त कस्तुरी के पति और आजाद भारत में ‘महिला-मंगल’ की संचालिका विधवा कस्तुरी और कस्तुरी की इकलौती बेटी मैत्रेयी, जो न केवल काॅलेज की षिक्षा प्राप्त कर रही है, बल्कि काॅलेज की राजनीति में भाग लेती है। कस्तुरी की बेटी मैत्रेयी में अभिाव्यक्ति की आजादी है, भले ही अभिव्यक्ति के खतरे भी झेलती हैं। आजादी पूर्व की कस्तुरी और आजाद भारत की बेटी मैत्रेयी के हालातों में जो परिवर्तन दिखता है, वह वस्तुतः गुलाम और मध्यकालीन भारत का आजाद और लोकतांत्रिक भारत का अंतर है। तभी तो कस्तुरी की शादी के प्रसंग और मैत्रेयी की शादी के प्रसंग में एक बङा परिवर्तन दिख पङता है। कस्तुरी बेच दी जाती है और मैत्रेयी की शादी बिना तिलक-दहेज के, वह भी एक डाॅक्टर से होने जा रही है। स्थितियों का परिवर्तन समय का बदलाव भी है। समय बदल गया और सिद्धांत बदल गये तो स्थितियाॅ भी बदल जाती है। आजाद भारत में आरम्भ से ही सदियों से बंद स्त्री षिक्षा के द्वार को खोल दिया गया। जिसका परिणाम हमें कस्तुरी की बेटी मैत्रेयी के रुप में मिलती है। आजाद भारज ने स्त्री-षिक्षा के द्वार खुले तभी तो मैत्रेयी में स्वतंत्रता और समानता का भाव और विचार जागा। आजाद भारत में ही अभिव्यक्ति की आजादी मिली जिसकी खुशबू हमें मैत्रेयी के विचारों में मिलता है ।


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