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साहित्य-सृजन और आस्वादन का आनन्द

मनोज पराशर,

हिन्दी विभागाध्यक्ष, मुंशी लाल आर्य काॅलेज,बी0 एन0 मंडल विवि,

कसबा, पूर्णिया, मधेपुरा, बिहार

 

साहित्य मानवीय प्रयास का प्रतिफल है। साहित्य सृजन और आस्वादन के स्तर आनन्द प्रदान करता है। मानव-मूल्यों में आनन्द सर्वोपरि स्थान रखता है। इसलिए साहित्य और मानव-मूल्यों के रुप में आनन्द को प्रस्तुत करना अध्येता का उद्देश्य है। साहित्य सृजन मानवीय स्वभाव की सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति की आदिम एषणा है, जिसे अरविन्द ने ‘मानव-मानस की अतुल शक्तिमयी अभिव्यक्ति की पीपासा’ कहा है। अरविन्द के शब्दों में साहित्य ‘विराट अनुभूति की सौभाग्यशालिनी अभिव्यक्ति’ है। साहित्य मानवीय संवेदना, कल्पना और अभिव्यंजना का प्रस्फूटन है। यह जन और पर्यावरण, जीवन और जगत के प्रति व्यक्ति का मानसिक और भावात्मक प्रकाशन है। साहित्य चिंतकों ने साहित्य को ‘रागात्मक अनुभूति की रसात्मक अभिव्यक्ति कहा है। साहित्य में सत्यम् और शिवम् की सुन्दरतम अभिव्यक्ति होती है। साहित्य को स्वांतः सुखाय मानने वाले साहित्य चिंतक भी दूसरों तक व्याप्ति के लिए इसे आत्माभिव्यक्ति का साधन मानते हैं। मनोवैज्ञानिक साहित्य को कुंठा की अभिव्यक्ति मानते हैं। उदार कल्पनाओं और विदग्ध वाणियों को साहित्य कहा गया। साहित्य भाषा में आदमी होने की तमीज सीखाता है।

 

साहित्य की उपयोगिता और आवश्यकता क्या है ? साहित्य का प्रयोजन क्या है ? साहित्य जरुरी क्यों है ? यह साहित्य के लिये अस्तित्वपरक प्रश्न है। साहित्य आदिम युग से उत्तर आधुनिक युग तक अनवरत अपनी उपयोगिता सिद्ध करते आया है। मनुष्य उसी चीज को अपनाता है जिस चीज की उसे उपयोगिता महसूस होती है। साहित्य जरुरी है जीवन की उदासीनता में उमंग का रंग भरने के लिये, कुरुपता को सजाने के लिये, मानवीय मूल्यों की प्रस्थापना हेतु, मानवीय कल्पना, संवेदना और अभिव्यंजना के प्रस्फूटन और परिष्करण हेतु, जीवन को जानने, समझने और बेहतर बनाने के लिये साहित्य जरुरी है। साहित्य सृजन से आस्वादन तक मनुष्य की आत्म-पीपासा को तुष्ट करता है। साहित्य मनुष्य की सौंदर्यचेतना की अभिव्यक्ति है और वह उसके सौंदर्यबोध को निखारता भी है। आज का साहित्य तो मानव चेतना के विस्तार के दायित्व भार से लवरेज है। साहित्य मानव का मानसिक, आत्मिक और नैतिक विकास करते हुए उसकी सौंदर्य चेतना, कल्पनाशक्ति और समग्र व्यक्तित्व का विकास करता है। साहित्य में मानवीय वृतियों और परिस्थितियों का विराट चित्रण मिलता है। मंदिरों, मठों और विहारों में रहकर साहित्य भक्ति भावना और लोककल्याणकारी भावों से जुङा रहा है। राजाश्रय में पलता-बढता साहित्य स्तुति-गान, श्रृंगार और वीर भाव को अभिव्यक्त करता रहा है। प्रजातांत्रिक युग में साहित्य प्रगतिवादी चेतना, प्रजातांत्रिक मूल्यों और मानवतावाद के प्रसार का स्रोत बना है।

 

साहित्य का प्रयोजन मानव-मूल्यों की प्रस्थापना है। साहित्य का हित भाव, लोक मंगल की कामना, सौंदर्यबोधी मूल्यों का विकास, विरेचन की विशेषता आदि ये सभी मानव-मूल्यों की रक्षा के निमित्त हैं। साहित्य चाहे आह से निकले या वाह से, विरह से जन्म ले या प्रेम से, भक्ति से जन्म हो या श्रृंगार भाव से, हर हाल में साहित्य मानव-मूल्यों के संरक्षण-संबर्द्धन हेतु प्रयासरत रहता है। साहित्य का उद्देश्य, उसका प्रयोजन मानव जीवन को बेहतर बनाना है। मानव जीवन को सामाजिक, नैतिक और सौंदर्यबोधी मूल्यों से सम्पन्न करने के उद्देश्य से ही लेखक-पाठक साहित्य लेखन और आस्वादन से जुङता है। व्यक्ति को नैतिक और सामाजिक मूल्यों से जोङकर उसे एक सभ्य और सुसंस्कृत व्यक्तित्व प्रदान करना ही साहित्य का प्रयोजन है। अपने प्रयोजन की पुष्टि हेतु साहित्य लेखक और पाठक में आनन्द की अनुभूति करता है। इस तरह साहित्य मानव जीवन में ज्ञानात्मक संवेग और संवेगात्मक ज्ञान को विकसित करता है।

 

साहित्य में आनन्दप्रदायिणी शक्ति होती है, इस सत्य को दुनिया के सभी साहित्याचार्यों ने स्वीकार किया है। साहित्याचार्यों ने साहित्य की सर्जना और आस्वादन से प्राप्त होने वाले आनन्द को साहित्य का मूल प्रयोजन बताया है। भारतीय साहित्य चिंतकों ने आरम्भ से ही ‘रसात्मक वाक्य को काव्य मानने पर जोर डाला है। भरतमुनि से लेकर आचार्य विश्वनाथ तक सभी चिंतकों ने आनन्द को काव्य का प्रयोजन माना है। साहित्य चिंतन में आनन्दवाद एक प्रमुख विचारधारा के रुप में स्थापित है। भारतीय काव्यशास्त्रीय चिंतन में रस-निष्पत्ति के सिद्धांत की सूक्ष्म व्याख्या प्रस्तुत करते हुए रस के आनन्द स्वरुप की विषद विवेचना की गयी है। आनन्द को काव्य का प्रयोजन स्वीकार करने में पाश्चात्य और भारतीय काव्यचिंतकों में से कोई पीछे नहीं रहे है। आनन्द क्या है? आनन्द की प्रक्रिया क्या है? आनन्द आत्मनिष्ठ है या वस्तुनिष्ठ? आनन्द का स्वरुप कैसा है? क्या आनन्द सुखात्मक है? ऐसे अनेक सवालों पर साहित्य चिंतक विचार करते रहे हैं।

 

साहित्य और कला में जिस आनन्द की बात की जाती है, उसका संबंध मानव से है, मानवेतर प्राणी के आनन्द भाव को इसमें शामिल नहीं किया जा रहा है। क्योंकि आनन्द के संदर्भ में दर्शन, जीवविज्ञान जैसे अनेक विषय में मानवेतर प्राणी को भी अध्ययन में समेटा गया है। दर्शन में तो व्रह्म, जगत और आत्मा के स्वरुप को आनन्दमय बताया गया है। इसलिए आनन्द के स्वरुप ,स्वभाव, प्रभाव के विमर्श का व्यापक फलक बन जाता है। विकिपीडिया में आनन्द को परिभाषित करते हुए लिखा गया है -‘‘आनन्द उस व्यापक स्थितियों की व्याख्या करता है, जिसका अनुभव मनुष्य एवं अन्य जन्तु सकारात्मक, मनोरंजक और तलाश योग्य मानसिक स्थिति के रुप में करते हैं। इसमें विशिष्ट मानसिक स्थिति जैसे सुख, मनोरंजन, खुशी, परमानन्द और उल्लासोन्माद भी शामिल है।’’ इतना तो स्पष्ट है कि आनन्द व्यक्ति की मनोदशा और भावदशा की एक विशेष स्थिति है। इस मनोदशा को विचारकों ने प्रायः सुखात्मक और साकारात्मक अवस्था माना है। लेकिन नकारात्मक और दुखात्मक अवस्था से मुक्ति को भी आनन्द के रुप में स्वीकार किया गया है। आनन्द के सुखात्मक और दुखात्मक स्वरुप की चर्चा साहित्य चिंतन में अत्यन्त गंभीरता से किया गया है।

साहित्य और कला का मूल प्रयोजन आनन्द है। आनन्द मन की एक विशेष अवस्था है। आनन्द मन की ऐसी अवस्था है, जहाॅ चेतना विस्तार पाती है, चित्त चमत्कृत हो उठता है। मन-प्राण विश्रांति महसूस करता है। आवेग संतुष्ट होकर शमित हो जाते हैं। साहित्य और कला की रचना और आस्वादन से लेखक और पाठक में एक साम्यावस्था उत्पन्न होता है। आवेगों का संतुलन, भावों-विचारों का शमन, अनुतापों का विरेचन ही तो साहित्य और कला का प्रयोजन है। बेहतर मनुष्य बनाने के लिए साहित्य और कला मानवीय संवेदना को परिशोधित करती है। आनन्द को भारतीय दार्शनिकों ने चित्त की अवस्था कहा है। चित्त की इस अवस्था का चित्रण करते हुए मनीषियों का कहना है कि ‘सच्चिदानन्द आत्मस्वरुप’ है। सत्, चित्त, आनन्द की अवधारणा का व्यापक और गंभीर विश्लेषण भारतीय चिंतन में मौजूद है। मनीषियों का कहना है कि आत्मा का स्वरुप आनन्द प्रद होता है। सत् चित्त में ही आनन्द उपस्थित हो सकता है। यहि व्यक्ति का चित्त सत् गुणों से संचालित होगा तभी आत्मा आनन्द की अनुभूति कर सकती है। आत्मा, सत् और चित्त के गंभीर विश्लेषण में न फॅसकर आनन्द को सीधे-सरल शब्दों में जानने की कोशिश करें तो हम कह सकते हैं- ‘आनन्द मन की एक अवस्था है, चित्त की एक दशा है और है चेतना का विशिष्ट स्वरुप। इस विशेष अवस्था में मन मम् से ममेतर हो जाता है। अहं का विगलन हो जाता है। स्व का सर्व में समंजन हो जाता है। आनन्द को चित्त की साम्यावस्था कहते हैं। सामान्य समझ में आनन्द ‘मन मगन हुआ तो मस्त हुआ’ के रुप में देखा जाता है। उमंग की उर्जा, तरंगित मन, उल्लसित चित्त, उत्फूल चेतना, स्मित चेहरा आनन्द का लक्षण है।

 

आनन्द एक प्र्रभावकारी दशा है। आनन्द को मानवीय व्यवहारों में देखा जा सकता है। आनन्द की अवस्था का प्रभाव व्यक्ति के तन-मन पर प्रत्यक्ष दिखायी पङता है। भारतीय चिंतकों ने आनन्द की इस अवस्था को समाधि की अवस्था कहा है। समाधि की अवस्था में मानव का तन, मन और आत्मा आनन्दित रहता है। इस तरह तो आनन्द के साथ-साथ समाधि जैसा एक और गंभीर दार्शनिक शब्द व्याख्या की मांग करता है। समाधि की अवस्था में मन की गहन एक्रागता की चर्चा की जाती है। कहा जाता है कि समाधि की अवस्था में चेतना सर्वाधिक सजग होती है। आत्मा प्रसन्नता का अनुभव करती है। सत्व गुण से सम्पन्न मनोदशा में तन की चमक और मन का भाव खिल उठता है। समाधि को ध्यान की अवस्था कहा गया है। ध्यान की अवस्था में चेतना निर्विकार और निर्विचार होती है। एक वृहदाकार शून्य उपस्थित होता है। समाधिस्थ चेतना में साक्षी भाव उभर आता है। वह द्रष्टा होता है। रचना का स्रष्टा पहले द्रष्टा होता है।  अब यदि यह कहा जाय कि समाधिस्थ चेतना आनन्दमय अनुभव  करती है, तो क्या हम आनन्द की उस अनुभूति को पहचान पा रहे हैं। नहीं न। यह अनुभव के बिना शब्दों से नहीं जाना जा सकता। आनन्द का स्वरुप सुखात्मक है या दुखात्मक – इस विषय पर सारे विश्व साहित्य में साहित्य चिंतकों ने गंभीर विचार-विमर्श किया है। सवाल उठता है कि काव्य और कला से आनन्द की प्राप्ति होती है – तो क्या उसमें केवल सुखात्मक क्षणों को समेटा गया है या मानव जीवन के दुखात्मक क्षण में उसमें अंकित किये गये हैं? पाश्चात्य दर्शन में ‘दुखात्मक नाटकों’ के प्रसंग में ही साहित्य चिंतन आरम्भ हुआ। फिर यह सवाल बनना लाजिमी है कि जब आनन्द सुखात्मक है तो फिर क्यों कोई प्रेक्षक  जाकर दुखान्तक नाटक देखने नाटक-गृह जाता है?

 

आनन्द सुखात्मक भाव मात्र में है या यह दुखात्मक भावों से भी प्राप्त हो सकता है। सुखात्मक भाव वे हैं जो चित्त को प्रसन्नता से भर दे। प्रेम, करुणा, ममता, दया, सहानुभूति जैसे भाव सुखात्मक और साकारात्मक भाव हैं। जबकि घृणा, ईष्र्या, द्वेष, नफरत, क्रोध, लोभ, मद आदि नकारात्मक भाव हैं। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह को भारतीय दर्शन में अवगुणों में गिना जाता है। साहित्य और कला में समस्त मानवीय भावों का प्रेक्षण होता है। प्रेम और घृणा, का्रेध और करुणा, लोभ और त्याग, द्वेष और दया, अहंकार और समर्पण, शांत और रौद्र, ये सभी भाव साहित्य और कला में चित्रित होते हैं। फिर भाव के सुखात्मक और दुखात्मक होने के बावजूद साहित्य और कला से प्राप्त होने वाला आनन्द केवल सुखात्मक कैसे हो सकता है?

 

आनन्द मानवीय मन की ऐसी अवस्था है, जिसकी वह पुनरावृति चाहता है। मानव मन बार-बार सुखात्मक अनुभूतियों को दोहराता है। मन की जिस अवस्था को मनुष्य बार-बार पाना चाहता है, उसके सुखात्मक होने की संभावना प्रबल है। इसलिए लोग कहते हैं कि आनन्द एक सुखात्मक अनुभूति है। अब यदि आनन्द को सुखात्मक अनुभूति मान लेते हैं तो सवाल उठता है कि सुख क्या है? सुखात्मक अनुभूति को जानने के लिए स्थितियों का प्रत्यक्षीकरण आवश्यक है। उमस में ठंठी हवा की अनुभूति सुखात्मक होती है। सुखात्मक तो शौच-निवृति भी है। दुख से मुक्ति भी सुखात्मक होती है। वस्तुतः सुख को भौतिक और ऐन्द्रिक सुख से जाना जाता है। साधन और सुविधा से उत्पन्न संतुष्टि सुख देता है। सुख इन्द्रियानुभूत होता है। शब्दाश्रित कला साहित्य में इन्द्रियानुभूत सुख कैसे प्राप्त होता है, यह भी चिंतन का विषय है।

 

सुखद अनुभूतियों को आनन्द की अवस्था कहा गया है। सुखद अनुभूतियाॅ  वह है जो मन-प्राण को खुशी और संतुष्टि से भर दे। जिन भाविक और बौद्धिक क्रियाओं से खुशी और संतुष्टि प्राप्त होती है, वह सुखद है। दुख से मुक्ति, विकारों का शमन, कुंठाओं की संतुष्टि भी सुखद है। सुखद वह भी है जो दुखद नहीं है। यह भी सच है कि सुखद अनुभूतियों के विश्लेषण पश्चात् हम पाते हैं कि यह तो दुखद अनुभूतियों से मुक्ति मात्र है। दीप के जलने से जो उजाला फैलता है वह मूलतः अंधेरों का मिटना मात्र है। यह प्रकाश उस अंधेरे के बिना व्याख्यायित ही नहीं हो सकता है। इसलिए सुखद अनुभूतियाॅ और दुखद अनुभूतियाॅ सहजात, सहोदर है। एक को जानने-समझने के लिए दूसरे को जानना जरुरी है। दुख के बिना सुख, विषाद के बिना हर्ष, क्रोध के बिना करुणा, स्वार्थ के बिना त्याग, अहंकार के बिना समर्पण, लोभ के बिना दान, मोह के बिना वैराग्य को जानना मुश्किल है। साहित्य और कला में ये सभी भाव लोकहित में चित्रित होता है। रस-निष्पति का सिद्धांत और साधारणीकरण का सिद्धांत रस रुप में प्राप्त होने वाले आनन्द की प्रक्रिया की व्याख्या ही तो करता है।

 

आनन्द एक प्रक्रिया का प्रतिफल है। साहित्य और कला से रस निष्पति होती है, जो अन्ततोगत्वा आनन्दकर होता है। सभी भारतीय आचार्यों ने रस का स्वरुप आनन्दकर स्वीकार किया है। भारतीय चिंतन की प्रचलित मान्यताओं के अनुसार रस का वर्गीकरण करते हुए उसे नौ भागों में विभक्त किया गया है। शांत, श्रृंगार, को छोङकर  वीर, रौद्र, विभत्स रस आदि तो नकारात्मक भाव हैं। फिर भावक ऐसे पाठादि से कैसे आनन्द को प्राप्त करता है? इस सवाल का जबाब देते हुए भारतीय चिंतकों ने ‘साधारणीकरण’ जैसे सिद्धांत को उपस्थापित किया। आनन्द आत्मगत है या वस्तुगत ? आनन्द की अनुभूति आत्मनिष्ठ होती है या वस्तुनिष्ठ ? इस सवाल के जबाब में विचारकों में मतभेद दिखता है। सशक्त समूह का कहना है कि आनन्द का आस्वादन अन्ततोगत्वा आन्तरिक स्तर पर होता है। इसलिए आनन्द की अनुभूति का आधार आत्मनिष्ठ ही है। मनुष्य का मन आनन्द की अनुभूति से प्रभावित भी होता है और उसका मन आनन्द को प्रभावित भी करता है। यही कारण है कि एक ही आनन्द स्रोत से अलग-अलग व्यक्ति अपनी मनोदशा, पूर्वाग्रह, संस्कार आदि के कारण अलग-अलग प्रकार और परिणाम में सुख का अनुभव करता है। यही कारण है कि ईश्वरीय रचना हो या मानवीय सृजन – आस्वादक पर अलग परिणाम में प्रभाव डालता है।

 

साहित्य और कला के विषय में तीन स्तरों पर चिंतन करना चाहिये। सबसे पहले रचनाकार, फिर रचना और तब पाठक को ध्यान में रखकर विचार करने की आवश्यकता है। भारतीय काव्यशास्त्रीय चिंतन में कवि को स्रष्टा की संज्ञा दी गयी है। सृष्टि की रचना करने वाला रचनाकार के विषय में जानने का सबसे पहला सवाल मन में यही उठता है कि रचना करने के पीछे रचनाकार का क्या उद्देश्य होता है? रचना करने के पीछे रचनाकार का क्या प्रयोजन होता है? रचना प्रक्रिया के दौरान रचनाकार की भावदशा और मनोदशा कैसी होती है? इन सवालों के जबाब ढूॅढने का प्रयास भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र में बङी गंभीरता से किया गया है। रचना से रचनाकार का क्या प्रयोजन है? इस सवाल का जबाब काव्यशास्त्र के आदि पुरुषों ने ही तलाश करना आरम्भ कर दिया था। भारत में भरतमुनि और यूनान के प्लेटो ने सबसे पहले इस सवाल को उठाया। साहित्य और कला के आस्वादन से भावक को संतुष्टि और शकून मिलता है। यह संतुष्टि और शकून क्या आनन्द नहीं है। तन्मयता और तादात्म्य के कारण पाठक और दर्शक को साहित्य और कला से आनन्द प्राप्त होता है।


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