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उषाप्रियंवदा कृत “शेषयात्रा” उपन्यास में सामाजिक मूल्य-विघटन : Dr.K.Anitha

उषाप्रियंवदा कृत “शेषयात्रा” उपन्यास में सामाजिक मूल्य-विघटन
“हम जियें भी तॊ इस तरह से जियें
जैसे तूफॊं में जल रहे हों दिये । ”

भूमिका: समाज के विभिन्न मूल्यॊं के आधार पर सामाजिक नियमॊं का निर्माण किया जाता है।युग के साथ मनुष्य बदलता है। मनुष्यॊं के साथ मूल्यॊं में परिवर्तन आवश्यक है ।जैसे-जैसे युग बदलता है वैसे-वैसे मूल्य भी बदलते जाते हैं।समाज के सभी मूल्य समान रूप से महत्वपूर्ण भी नहीं होते ।यही स्थिति मूल्यॊं में संघर्ष उत्पन्न करती है और सामाजिक मूल्य विघटन की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
उषाप्रियंवदा प्रस्तुत उपन्यास में सामाजिक मूल्य-विघटन को यथार्थ,मार्मिक तथा सहज शैली में चित्रित किया है।उपन्यास का शीर्षक ही सामाजिक मूल्य विघटन को सूचित करता है। शेष का अर्थ है बचा हुआ और यात्रा क अर्थ एक स्थान से अन्य स्थान पर जाना अर्थात ऎसी यात्रा जो शेष है।
आज सामाजिक मूल्यॊं में बदलाव आने के कारण मूल्य विघटन की स्थितियां बढ रही हैं। इसके अंतर्गत दांपत्य जीवन की विषमताएं और पारिवारिक मूल्यविघटन,पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव और सांस्कृतिक मूल्य विघटन,वैयक्तिक मूल्य विघटन,नैतिक मूल्य विघटन,आदि देखे जा सकते हैं।
१. दांपत्य जीवन की विषमताएं और पारिवारिक मूल्य-विघटन
दांपत्य संबंधॊं पर ही परिवार टिका होता है।जब दरार आती है तो पारिवारिक मूल्य-विघटन की स्थितियां उत्पन्न हो लगती है।”शेषयात्रा” उपन्यास में एक ऎसा मद्यवर्गीय आधुनिक वर्ग है जो पारिवारिक मूल्यॊं को महत्व न देता तथा दिशाहीन होकर भटकता है।जब उन्हें होश आता है तब तक बडी देरी हो चुकी होती है और जीवन यात्रा की शेषयात्रा उन्हें अकेले ही तय करनी होती है।
२. पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव और सांस्कृतिक मूल्य-विघटन
आधुनिक युग में संस्कृतिक व्यवस्था में असंतुलन उत्पन्न हो रहा है।भौतिकवादी मनॊवृत्तियों में वृद्धि होना तथा परंपराओं के प्रति निष्टा में कमी भी सांस्कृतिक मूल्य-विघटन के लिए एक प्रमुख कारण है।उषाप्रियंवदा के प्रस्तुत उपन्यास में पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव तथा सांस्कृतिक मूल्य-विघटन को चरित्रॊं के द्वारा उभारा गया है।अनु का विवाह डां.प्रणव के साथ होता है वह अमेरिका आती है।तीन चार साल बाद प्रणव अनु को तलाक देकर किसी और लडकी के साथ चला जाता है अनु अमेरिका में अकेली रह जाती है। इतना होने पर भी वह भारत वापस नहीं जाती है और न ही परिवार के लोग भी कोई पूछताछ नहीं करतें।
भारतीय संस्कृति में इस तरह की स्थितियां नहीं होती क्यॊंकि, विवाह के बाद भी लडकी मायके के बराबर संबंध और संपर्क रखती है तथा समस्याएं आने पर बडे लॊगॊं को बताकर दूर कर दी जाती हैं ।आज के जीवन की व्यस्तता ने संबंधॊं की सारी मधुरता सोख ली है। जीवन के कूछ आंरंभिक वर्षॊं में ही पति-पत्नी से रहते हैं बाद में सारा जीवन एक समझौता बनकर रहा जाता है।अनु और प्रणव यह समझौता नहीं करते और अलग हो जाते हैं।
३. वैयक्तिक मूल्य-विघटन
मूल्यॊं के निर्माण में भावॊं की प्रधानता होती है और भावों से रस की उत्पत्ति होती है। यही भावात्मक रस विभिन्न वैयक्तिक मूल्यॊं को स्थापित करते हैं।उषा जी ने शेषयात्रा उपन्यास में व्यक्तिवादी मूल्य-विघटन के अंतर्गत युवापीढी को दिखाया है जो समाज की प्राचीन रूढियों और परंपराऒं का विरोध करते दिखाई देते हैं। आज अहं का अर्थ बदल गया है। समाज में अराजकता और अनैतिकता पनप रही है। डां.प्रणव भारत आकर डाली को पसंद करता है और विवाह अनु से करता है।इसी उपन्यास में दायित्व वहन का बोध भी है तथा दूसरी ऒर विशृंखल होते व्यक्ति मूल्यॊं का चित्रण है।
चंद्रिका का आकर्षण प्रणव को अपनी ऒर खींच लेता है।उसके आगे प्रणव को अनु के साथ वैवाहिक जिंदगी बहुत लचर और बेमानी लगने लगी थी ।अंतत:वह उसे छॊड देता है।प्रणव शिक्षित होकर भी आदर्श व्यक्ति नहीं बन पाता है।पत्नी को छॊडना, उसके वैयक्तिक मूल्य-विघटन की ओर संकेत करता है।
४. नैतिक मूल्य-विघटन
वर्तमान युग में हर जगह नैतिक मूल्य-विघटन की स्थितियां विद्यमान हैं।उषा जी इस उपन्यास में डां.प्रणव,डां.वाटरमेन जैसे लोगों द्वारा नैतिक हीनता की स्थितियां प्रकट हुई है। प्रणव से विवाह करके अमेरिका आने पर प्रणव अपनी मित्र डं.विभा से अनु को कई बातें सिखाने को कहता तब विभा उससे डेटिंग के विषय बताती है।अनु कहती हैं कि उसने डेटिंग नहीं की।डेटिंग भारतीय संस्कृति के अनुसार अनैतिक कार्य है।
विभा अकेलापन से बचने के लिए शराब पीने और गोली खाने को सही मानते है।डां.वाटरमेन अनु से प्रणव को छोड देने को भी कहता है और उसके साथ एक रात रहना चाहता है।ये सारी स्थितियां नैतिकमूल्य हनन की ओर संकेत करती हैं। विवाह से पूर्व डां.प्रणव का,चंद्रिका का किसी अन्य से शारीरिक संबंध होना इसी बात के ओर संकेत करता है।
निष्कर्ष:
समाज और मानव का संबंध अन्यॊन्यास्रित है।नव समाज कुरीतियॊं से जब सडने लगता है।तब मानव जीवन भी अंधकारमय हो जाता है।आधुनिक युग में परिस्थितियां बदलने के साथ -साथ मूल्यॊं में परिवर्तन आ रहा है।
उषाप्रियंवदा ने अपने उपन्यास में सामाजिक मूल्य-विघटन की स्थितियों को बडे ही व्यापक पैमाने पर चित्रित किया है। उषा जी जीवन के बदते हुए मूल्यॊं,कुंठा,निराशा,घुटन,पराजय आदि को तटस्थ एवं निवैयक्तिक ढंग से अपनी रचना में प्रस्तुत करती दिखाई देती है।लेखिका ने यथार्थ के माद्यम से सामाजिक मूल्य-विघटन को बडी ही ईमानदारी से चित्रित किया है।उन्हॊने सामाज में उत्पन्न समस्याऒं एवं मूल्य-विघटन का विषद और व्यापक वर्णन करते हुए समस्याऒं से मुक्ति पाने की आशा व्यक्त की है।
एक सफल व्यक्ति बनने की
कोशिश मत करॊ
बल्कि मूल्यॊं पर चलने वाले व्यक्ति बनॊ ।

Dr.K.Anitha
Asst.Professor
G.V.P.Degree&p.G.Courses[A],
M.V.P.Campus,
Visakhapatnam.


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