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साहित्य और समकालीनता

साहित्य और समकालीनता

डाॅ. कर्रि. सुधा

संपादक
तेजस्वी अस्तित्व (शोध पत्रिका)
सह-आचार्य
विभागाध्यक्ष – हिन्दी विभाग
विशाखा गवर्नमेंट डिग्री और पी.जी. विमन काॅलेज,
विशाखापट्टणम्, आन्ध्र प्रदेश – 530020.
मो.नं. 09849196582

समकालीन यथार्थ का चित्रात्मक स्वरूप ही साहित्य है । समकालीन विसंगतियों का व्यंग्य-विद्रूप साहित्य की विशेषता है । साहित्य का समकालीन परिस्थितियों से गहरा संबंध है । इसीलिए शायद साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया । कहने का तात्पर्य यह है कि युगीन परिस्थितियों के अनुसार साहित्य सृजन होता है । उससे प्रेरणा पाकर साहित्यकार साहित्य सृजन करता है । किसी भी युग की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक समस्याओं का समग्र चित्रण ही समकालीन-बोध है । जैसे-जैसे ये परिस्थितियाॅं बदलती हैं, उन्हीं के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक मान्यताएॅं भी स्वयं ही परोक्ष रूप में नित्य नवीन रूप धारण कर लेती हैं । कुछ समय के पश्चात् परंपरागत विचारधारा गौण होती है तथा प्रचलित भावधारा प्रमुख बन जाती है । उपर्युक्त विवेचनों से यह स्पष्ट होता है कि प्रचलित भावधारा परंपरागत विचारधारा का स्थान ले लेती है और परंपरागत विचारधारा गौण बन जाती है । साहित्यकार समाज में प्रचलित स्वरूप को व्यक्त किये बिना नहीं रह सकता । इस प्रकार तत्कालीन साहित्य को प्रभावित करने का श्रेय समकालीनता को ही है । निस्संदेह हम यह कह सकते हैं कि साहित्य में समकालीनता का अत्यंत महत्व है ।

साहित्य ओैर समकालीनता संबंध के मूल पर विचार करते समय प्रायः चार हिन्दी कवियों का नाम उल्लेखनीय है: कबीर, निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध ।’ इस आधार पर ‘समकालीन कविता की भूमिका की लेखिका डाॅ. सुधा रणजीत ने ‘कबीर’ से समकालीन कविता का आरंभ माना है । उन्होंने अपना तर्क देते हुए कहा है: ‘निरंतर परंपरा की कोई अपेक्षा जरूरी न हो तो फिर कबीर को समकालीन कविता का प्रवर्तक क्यों माना जा सकता है, क्योंकि विचार बोध काव्य बोध और स्वभाव: बोध की दृष्टि से अधिकांश समकालीन कवि अपने किसी पूर्वज से प्रेरित होते रहे हैं तो कबीर से भी ।‘‘1, लेकिन इसके मूल आदिकालीन साहित्य से ही मिलता है । अगर इस समय के साहित्य को देखें तो उसमें तो सारी की सारी रचनाएॅं राजाओं की प्रशंसा करते हुए ही लिखी गयी । उस समय साहित्य की रचना राजाओं की प्रशंसा के लिए लिखा जाता था । इस युग में साम्राज्यकांक्षा के कारण अधिक युद्ध होते थे । युगीन परिस्थितियों से प्रेरणा पाकर कवियों ने साहस और उूर्जा का संचार करना अपना कर्तव्य समझा । भक्तिकाल में मुसलमान राज्य भारत वर्ष में प्रायः प्रतिष्ठित हो चुका था । वैसे नैराश्य और अवसाद के वातावरण में कवियों ने अपने उपास्य देव के स्वरूप और चरित्र निरूपण में डूब हुए थे । भक्तिकाल में मुसलमान शासकों के शासन में लोग संत्रस्त थे । इसलिए समकालीन-बोध का विस्फोट पहली बार मध्ययुगीन साहित्य में हुआ । तत्कालीन समाज की दुरवस्था का यथार्थ रूप का अंकन निम्न कविता में यों अंकित किया गया है ।

‘‘खेती न किसान को, भिखारी को न भीख,

बलि,बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी ।‘‘2,

इन परिस्थितियों के कारण निम्नवर्ग में जन्म लेकर, दुर्भर जीवन बिताने वाले कवि उस व्यवस्था की निंदा की । इन कवियों में रैदास, कबीर, सरहपा, दादू, नानक आदि उल्लेखनीय हैं । रैदास का मत है कि समाज के विभाजन का आधार कर्म है न कि जन्म । जन्म के आधार पर व्यक्ति के गुण-दोषों को निर्धारित करना अनुचित है । ‘‘रैदास जनम के कारणै, होत न कोई नीच / नर को नीच करि डारि हैं, ओछे करम की कीच ।।‘‘3, सर्वमानव समानता की भावना कबीर में अधिक रूप से मिलती है: ‘‘एक त्वचा, हाड, मल, मूत्र, एक रूधिर एक गूदा/ एक बूंद ले सृष्टि रच्यों है, को ब्राह्मण को शूद्रा ।‘‘4, तुलसीदास ने पीडित मानवजाति को मर्यादा पुरूषोत्तम् राम का लोकमंगल रूप दर्शाकर समाज को स्वस्थ पथ पर चलने के लिए उद्बोधित किया । सूरदास ने अपने गीतों से कृष्ण के रागात्मक मानवीय रूप से उदास मानव के हृदय जाति में आस्था एवं प्रेम भावना जगायी । इनसे भी बढ़कर जनसामान्य को काव्य का लक्ष्य बनानेवालों में प्रमुख कवि महात्मा कबीर हंै । वे केवल धर्मोपदेशक ही नहीं, वरन् पाखण्ड-धर्म के परम शत्रु थे । उनकी वाणी विस्फोटक थी । वे पीडित मानवता के पक्षधर थे । उनके वचन शोषकों के विरूद्ध प्रयुक्त आग्नेय अस्त्र ही है, वे जीवन की शाला से निकले हुए स्नातक थे । जात-पाॅंत का खण्डन वे जिस साहस के साथ करते हंै, वह और कहीं देखने में नहीं मिलता । इस कोटि के अन्य कवि नानक, दादू, रैदास, धर्मदास, मलूक दास, सुन्दर दास जिन्होंने जातिगत वैषम्यों का खण्डन कर स्वस्थ पथ प्रदर्शन किया । लेकिन रीतिकाल के कवि आश्रयदाताओं के मनोरंजन के लिए श्राृंगारपरक रचनाएॅं करने लगे ।

भारतेन्दु युग में नवीन चेतना का सूत्रपात हुआ । पश्चिमी विचारकों के चिन्तन के प्रभाव से लोग प्रभावित होने लगे थे । वैज्ञानिक आविष्कारों, नवीन शिक्षा प्रणाली के कारण परंपरागत भारतीय चिंतनधारा को प्रभावित किया । परिणामस्वरूप व्यक्तिवाद, नारी स्वातंत्र्य, राष्ट्वाद आदि का प्रचार होने लगा । इनमें भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र आदि प्रमुख हैं । जिन्होंने देश की यथार्थ स्थिति का चित्रण कर देशवासियों को राष्ट्ीय उद्बोधन से प्रेरित किया । द्विवेदी युग में समाज-सुधार एवं उत्थान की भावना का प्राबल्य रहा । छायावादी, रहस्यवादी कवि इतिवृत्तात्मकता से उूब गये । प्रकृति, लौकिक-अलौकिक अवलम्बन, काव्य के प्रेरक उपादान बने । प्रगतिवाद में आर्थिक साधनों पर समान नियंत्रण तथा वर्ग-विहीन समाज की स्थापना का आदर्श प्रस्तुत किया गया । शोषक वर्ग के प्रति तीव्र आ़क्रोष व्यक्त हुआ । द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् जीवन-मूल्य तेजी से बदले । स्वीकृत मानव-मूल्य परंपराएॅं तथा विश्वास नष्ट हो गये । चीनी, पाकिस्तानी और कार्गिल युद्ध की घटनाओं को लेकर कई साहित्यकारों ने रचनाएॅं की । देश की एकता और अखण्डता को बनाये रखने के उ्द्धेश्य कई उद्बोधनात्मक रचनाएॅं निकली । दूरदर्शन के चानलों पर भी देशभक्ति पूर्ण दृश्यों का प्रसार होने लगा था । शौर्य, शक्ति, साहस का संचार करना साहित्यकार का प्रधान कर्तव्य बन गया । साहित्यकारों ने इसे युग-धर्म समझकर इस चुनौती को स्वीकार की । भारतेंदु युग से ही कवियों ने समकालीन समस्याओं का चित्रण अपनी कविता के माध्यम से उजागर करने की दिशा में कदम बढाया । सर्वप्रथम सुधारवादी कवियों ने भारतमाता को विभिन्न राज्यों जैसे अंगों वाला सशक्त मानवी के रूप में चित्रित किया । अंग्रेजों के शोषण से संत्रस्त भारत की दुस्थिति का आॅंखों देखा वर्णन भारतेन्दु हरिष्चन्द्र की भारत दुर्दशा में प्रस्फुटित हुई है ।

‘‘आवहु सब मिलि रोवहु भारत भाई

हा ! हा ! यह भारत दुर्दशा न देखी जाई

सबके पहिले जेहि ईश्वर धनबल दीनो

सबके पहिले जेहि सभ्य विधाता कीन्हो

सबके पहिले विधाफल जिन गहि लीनो ।।

अब सबके पीछे सोई परत लखाई

हा ! हा ! भारत दुर्दशा न देखी जाई ।‘‘5,

कृषक जीवन की दयनीय दशा के मर्मस्पर्शी चित्र को प्रस्तुत करते हुए कवि कृषक के टूटी खाट, गरीबी, निस्सहायता आदि का सजीव चित्र खींचे हैं । कृषक का घर कष्टों का निलय है । गुप्त जी स्वयं कहते हैं: भगवान इन दीनों को कृषक न बनाकर, भिक्षु बना दें तो सही होती:

‘‘कृषि कर्म की उत्कर्षता

सर्वत्र विश्रुत है यही,

भिक्षुक बनाते पर विधे ।

कर्षक न करता था इन्हें ।‘‘6,

ग्रामीण पात्रों के करूणापूर्ण चित्र स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता में अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत किये गए हैं । समाज की अमानवीयता के शिकार होनेवाली पीडित ग्रामीण लोगों का सजीव चित्रण ‘ग्राम्या‘ में यों प्रस्तुत किया गया है । ‘‘दुःखों में पिस/ दुर्दिन में घिस/ जर्जर हो जाता उसका तन/ ढह जाता/ असमय यौवन धन ।‘‘7,लेकिन प्रगतिवादी कविता में यह चेतना अधिक दिखायी देता है । इसी विषय की अभिव्यक्ति कविवर दिनकर यों करते हैं ।

‘‘एक मनुज संचित करता है अर्थ पाप के बल से

और भोगता दूसरा उसे भाग्यवाद के छल से ।‘‘ ख्8,

समकालीन बोध का पूर्ण विकास आठवें और नवें दशक में हुआ है । माकर््सवादी चेतना से अभिप्रेरित प्रगतिवादी काव्य में इसके प्रति अत्यंत ध्यान दिया गया है । डाॅ. रांगेय राघव कृषक वर्ग की यथार्थ स्थिति का मर्मस्प्र्शी चित्रण करते हैं:

‘‘आह रे क्षुधित किसान !!!!

छीन लेता सब कुछ भूस्वामी

उगाता जोे श्रम से तू खेत

नहीं तेरा उसपर अधिकार !

अरे फोड से गदे नीच

झोंपडों में तू लू से त्रस्त,

सभ्यता की बलि जाता हाय

कर लिया करता है चीत्कार

अरे तेरे शिशु निर्बल काया !

बैल और तुझ में कितना भेद !

वही अच्छे जो करे न काम

सताती है यदि उनको भूख

किन्तु तू तो है अब भी दास

क्रीतसा ही मरता है नित्य ।‘‘ ख्9,

सामाजिक व्यवस्था की स्थिति इतना विचित्र है कि अमीर लोग पीढी दर पीढी से अमीर के रूप में, गरीब लोग गरीब के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे हैं । एक किसान का बेटा अपने विरासत के रूप में बाप से क्या पाता है – इसका सजीव चित्र केदारनाथ अग्रवाल अपनी कविता में यों खींचते हैं:

‘‘जब बाप मरा तब क्या पाया

भूखे किसान के बेटे ने

घर का मलवा, टूटी खटिया

कुछ हाथ भूमि, वह भी परती !!!

बनिये का रफपयों का कर्जा

जो नहीं चुकाने पर चुकता ।‘‘ख्10,

डाॅ. परमानंद श्रीवास्तव ने अपनी आलोचनात्मक पुस्तक, ‘शब्द और मनुष्य’ में यह निष्कर्ष निकाला है कि निराला की कविताओं को देखने से पता चलता है कि उनमें समकालीनता के लक्षण पूर्णतः विद्यमान हैं । इसी तरह निराला की कविता ‘‘भिक्षुक‘‘ समकालीन दलित वर्ग की यथार्थ कविता कही जाती है ।

‘‘वह आता

दो टूक कलेजे के करता पछताता

पथ पर आता

पेट-पीट दोनों मिलकर हैं एक

चल रहा लकुटिया टेक

मुट्टी भर दाने को, भूख मिटाने को

मुॅंह फटी पुरानी झोली को फैलाता ? ? ? ?‘‘11,

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविताओं में वर्ग-वैषम्यों का चित्रण सजीव रूप में मिलता है । कवि ने शोषित वर्ग के उत्पीडन में शोषक-पूॅंजीवादियों का उल्लास और विलास देखा है । वर्ग वैषम्य की इस अवस्था को कवि सह न पाये और वे क्ऱांति का आह्वान करते हुए यों कहते हैं ।

‘‘श्वानों को मिलते हैं दूध वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,

माॅं की हड्डी से छिपक ठिठुर, जाडों की रात बिताते हैं,

युवती के लज्जा वसन बेच जब ब्याज चुकाये जाते हैं,

मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी सा द्रव्य बहाते हैं ।‘‘12,

‘उूफान‘ शीर्षक कविता में कवि ने उपेक्षित एवं शोषित वर्ग के कंकालों का चित्रण किया है ।

‘‘क्या कहूॅं घुटते हृदय की बात

हड्डियों का ढेर जिस पर ललकते हैं गिद्ध,

भूमि राजा बेच अपने खेत, पथ पर दम रहे हैं तोड ।‘‘13,

आधुनिक हिन्दी कवियों ने शोषितों की पीडा को अपनी कविता का वणर््य विषय के रूप में स्वीकार लिया है ।

‘‘गीतों में पद-दलितों की ही

पीडा का मैं ने गान किया ।‘‘14,

स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले सभी के सामने एक ही प्रमुख समस्या थी, दास्य श्रुंखलाओं से विमुक्ति । लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात् हमारे सामने कई समस्याएॅं उठीं । जैसे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा पर्यावरण से संबंधित समस्याएॅं हैं । बढती हुई पूॅंजीवादी व्यवस्था के कारण समाज में वर्ग संघर्ष बढ़ कर, समाजवादी समाज की स्थापना समाज सुधारकों का लक्ष्य बन गया । साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों का भी नैतिक पतन होने लगा । इस व्यवस्था में परिवर्तन लाए बिना देश की वृद्धि आशानुरूप नहीं किया जा सकता । आर्थिक विपन्नताओं को सुलझाने के लिए सरकार ने पंचवर्षीय योजनाएॅं तथा अन्य कार्यक्रम शुरू किए, लेकिन देशवासी पूर्ण रूप से लाभ उठा न सके । गरीबी और भुखमरी देश का अंग बन गया । किसानों की दशा बिगडने लगी । शिक्षित बेकारी बढने लगी । पश्चिमीकरण की दौड में शिक्षा के क्षेत्र में अनेक समस्याएॅं उठ खडी हुईं । नारी जीवन से संबंधित अनेक समस्याएॅं भी समाजवादियों को विछलित करने लगे ।

परिणाम-स्वरूप स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कवि तथा अन्य साहित्यकार पहले से भी अधिक जन-जीवन के निकट आकर समस्याओं का अनुशीलन करने लगे । युगीन कवियों ने समकालीन समस्याओं का चित्रण करके समाज को युगीन बोध से बोधित करने का सफल प्रयास किया । ‘‘आज का समाज प्रमादी है । व्यभिचार, नृत्यगान, रिश्वतकोरी, चोरी, डकैती, लूट-मार आदि अनेक प्रवृत्तियों का बोलबाला है । सत्य की जगह असत्य का बोलबाला है । संस्कृत में कहा है: ‘‘सर्वे गुणाः कंचन माश्रायन्ति‘‘ आज के समाज में वही बडा है जिनके पास पैसा है । आज पवित्रवान व्यक्तियों का स्थान नहीं है ।‘‘15, हिन्दी साहित्य में साठोत्तर काल को समकालीन-बोध के विकास काल कह सकते हैं । सन् 1962 में चीन के साथ तथा सन् 1965 में पाकिस्तान के साथ जो युद्ध हुए, उनके उपरांत व्यापक मोहभंगों के कारण कवियों ने यह अनुभव किया है कि यथार्थ जीवन की स्थितियाॅं और समस्याओं से दूर रहकर काव्य रचना नहीं नहीं किया जा सकता । इससे साहित्य में यथार्थ की अभिव्यक्ति को महत्व मिला, परिणामस्वरूप स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता में असंतोष, अस्वीकृति, मोहभंग और विद्रोह का स्वर उभरा । साठोत्तर युगीन साहित्य को समकालीनता के चित्रण का विकास युग कह सकते हैं ।

ख्1, अद्यतन हिन्दी कविता: सं.डाॅ. रणजीत, भूमिका: पृष्ठ संख्या: 03

ख्2, कवितावली: तुलसीदास, उत्तरकांड: पृष्ठ संख्या: 32

ख्३ ,दलित साहित्य रचना और विचार: सं.पुरूषोत्तम सत्यप्रेमी: पृष्ठ संख्या: 21

ख्4, कबीर ग्रंथावली: पृष्ठ संख्या: 150

ख्5, भारतेंदु ग्रंथावली प्रथम खण्ड प्रथम संस्करण, सं.व्रजरलदास: पृष्ठ संख्या: 469

ख्6, भारत भारती: मैथिली शरण गुप्त: पृष्ठ संख्या: 92

ख्7, ग्राम्या: सुमित्रानंदन पंत: पृष्ठ संख्या: 19

ख्8, कुरूक्ष़ेत्र: दिनकर: पृष्ठ संख्या: 134

ख्9, मेधावी : रांगेय राघव: सर्ग: 14: पृष्ठ संख्या: 492

ख्10, फूल नहीं रंग बोलते हैं: पृष्ठ संख्या: 62

ख्11, भिक्षुक: ‘अपरा’: निराला: पृष्ठ संख्या: 67

ख्12, हुॅंकार: विपथगा: दिनकर: पृष्ठ संख्या: 73

ख्13, पिघलते पत्थर: पृष्ठ संख्या: 75

ख्14, प्रलय सृजन: शिवमंगल सिंह सुमन: पृष्ठ संख्या: 31

ख्15, कबीर एक समाज सुधारक: संत कबीर: लेखक: डाॅ. लक्ष्मीदत्त बी.पंडित: पृष्ठ संख्या: 247

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